क्या आप जानते हैं ?
क्या आप जानते है की एंटीन्यूट्रियंट क्या होते है।

क्या आपने कभी एंटीन्यूट्रियंट के बारे में सुना है।
एंटीन्यूट्रिएंट यानी की वह तत्व जो शरीर में किसी विशेष पोषक तत्व के अवशोषण को बाधित करे। या विशेष पोषक तत्वों के चयापचय (metabolism ) में उनको पचने में बाधा उत्पन्न करे। एंटीन्यूट्रियंट कहलाते है।
सुनने में अजीब लग सकता है। लेकिन प्रकृती में एंटीन्यूट्रिएंट भरे पड़े है। पेड़ पौधो में एंटीन्यूट्रिएंट किसी कीट या कीटाणु से खुद को व फल फूल की सुरक्षा के लिए प्राकृतिक रूप से बनते है।ये एंटीन्यूट्रिएंट पौधो की किस्म और प्रजाति व पौधो के अलग अलग भाग जैसे फूल फल बीज आदि में अलग अलग तरह के हो सकते है। तथा मानव शरीर पर भी इनके प्रभाव अलग अलग हो सकते है।
लेकिन मूल रूप से यह पोषक तत्वों या विशिष्ट तत्वों को खुद से जोड़ कर उन तत्वों के अवशोषण को बाधित करते है। इन एंटीन्यूट्रिएंट तत्वों का उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में सालो से हो रहा है। ये तत्व कोशिका के अंदर पाचन में सक्रिय भूमिका में पाचन को प्रभावित करते है।
हमारी शिक्षा प्रणाली में पोषक तत्वों को ही पढ़ाया जाता है।तथा उनके गुणों का ही गुणगान किया जाता है। यही वजह है की मात्र सघन चिकित्सीय शिक्षा में ही एंटीन्यूट्रियंट व एंटी विटामिन का जिक्र किया जाता है। यही वजह है की मिडिया या आम चर्चाओं में यह शून्य रहते है। और कोई भी पोषक तत्व विशेषज्ञ आपको इनके बारे में बता या समझा नहीं पाता और न ही साधारण चिकित्सक आपको बता पता है। और जो विशेषज्ञ चिकित्सक इसके जानकर होते है वो बताना नहीं चाहते है।
आधुनिक विज्ञानं में एंटीन्यूट्रिएंट का उपयोग जहां चिकित्सा क्षेत्र में किये जाते है। अधिकतर एंटीबायोटिक अपने आप में एक तरह की एंटीन्यूट्रिएंट होती है जिनका लक्ष्य संक्रमण के बैक्टीरिया को किसी भी तरह के पोषणहीन करके मारना होता है। वैसे ही फ़ूड प्रोसेसिंग में भी इनका उपयोग बढ़ चढ़ कर किया जाता है। विशेष रूप से परिरक्षको ( प्रीजर्वेटिव ) के रूप में किया जाता है।

ऐसे में हमें हमारी बीमारियों और पोषण में कमी को लेकर बहुत गंभीरता से सोचना हो होगा।प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एंटीन्यूट्रिएंट अधिकतर पकाने पर कम हो जाते है। लेकिन कृत्रिम एंटीन्यूट्रिएंट अधिकतर पकाये जाने के बाद या प्रोसेस में डाले जाते है।जिससे ये प्रभावशाली बने रहते है।एंटीन्यूट्रिएंट की एक लम्बी लिस्ट है जिसमे कई तरह के तत्वों का उपयोग चिकित्सीय व प्रोसेस फ़ूड इंडस्ट्री व जिम प्रोडक्ट में धड़ल्ले से हो रहा है।और जानकारी के अभाव हमें गंभीर रोगो तरफ धकेल दिया जा रहा है।
जैसे फाइटिक एसिड एक एंटीन्यूट्रियंट है जो कई पोषक तत्वों को अवशोषित होने में बाधा उत्पन्न करता है जैसे कैल्शियम ,मैग्नीशियम, लोहतत्वों (आयरन )तांबा व जस्ते (जिंक ) जैसे तत्वों को बाधित कर आंतो के पाचन में अवशोषण से रोकता है। जिसके फलस्वरूप इन तत्वों की शरीर में कमी हो जाती है।
आमतौर पर फाइटिक एसिड अनाज के छिलको ,सूखे मेवे ,और बीजो में होता है। लेकिन इनकी संख्या या मात्रा इतनी ज्यादा नहीं होती है।लेकिन प्रोसेस फ़ूड में इनकी मात्रा उत्पाद की सेल्फलाइफ की अधिकता पर निर्भर करती है।प्रोसेस फ़ूड में इसको E -391 के रूप में लिखा जाता है।
ऐसे ही ओक्सालिक एसिड एक एंटीन्यूट्रियंट है जो मुख्य रूप से कैल्शियम को बाधित करता है। तथा प्राकृतिक रूप से बीजो और अनाज में पाया जाता है। शरीर में अधिकांश रूप से बनने वाली पथरी ओक्सालिक एसिड के कारण केल्सियम के बंध जाने से बनती है जिसके कारण कैल्शियम ऑक्सलेट बनता है जिसे ही चिकित्सीय भाषा में पथरी कहते है।
ओक्सालिक एसिड को फ़ूड प्रोसेस फेक्ट्री के बर्तन व औजार साफ करने के काम में लिया जाता है। व कई स्थानों पर इसे कीटनाशक की तरह भी काम में लिया जाता है.मधुमक्खी पालन में इससे मधुमक्खी के छतो की सफाई में काम में लिया जाता है ,जिससे ऐसे छत्ते के शहद में इसकी मात्रा होना स्वभाविक रूप से मिलती है।
फ़ूडमेन इन्ही जानकारियों को सरल व आसान भाषा आप लोगो के सामने लाने की कोशिश में है।ताकि ज्यादा से ज्यादा आप एक अनदेखे षड्यंत्र से बच सके।
क्या आप जानते हैं ?
भोजन के अभिन्न हिस्से आलू/ टमाटर इत्यादि में छुपे जहर की पड़ताल

आलू/ टमाटर के ग्लाइको अल्कलॉइड( Glycoalkaloid )- प्राकृतिक क्षारीय जहर –
विश्वभर में भोजन में दैनिक रूप से आलू ,टमाटर उपयोग में लाया जाता है टमाटर के बिना तो कोई सब्जी ही नहीं बनती कुछ एक सब्जियों को छोड़ दिया जाये तो टमाटर हर सब्जी की जान है जबकि आलू भी एक दिन में किसी न किसी रूप हम उपयोग करते है। जंक फ़ूड आलू टमाटर के बिना हो ही नहीं सकता है।
आलू टमाटर दोनों में ही कुछ ग्लाइको कोलाइड पाए जाते है
ग्लाइको अल्कलॉइड- प्राकृतिक रूप से कई वनस्पतियों में पाया जाता है। ये पौधे या पेड़ के फलो ,तने,पत्तियों जड़ो या कंदो में या सम्पूर्ण पौधे या पेड़ में पाया जाता है। आमतौर पर यह छोटे पोधो के फलो और कंदो में पाया जाता है। प्राकृतिक रूप से इसका निर्माण पौधे और उसके फल व जड़ो की कीट पतंगों को दूर रखने के लिए होता है।
दूसरे शब्दों में कहे तो यह पौधे की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली है, जो पौधे को कीटो के हमले से बचाने के लिए होती है ये रक्षा प्रणाली अलग अलग तरह की हो सकती है; उनमे से एक है ग्लाइकोकलॉइड जो कुछ विशेष प्रकार के पौधों और कंद में देखने को मिलते है। आलू टमाटर ,बैगन ,मिर्च दिखते अलग अलग है विज्ञान में इनको एक ही प्रकार के नस्लीय परिवार “नाइटशेड फेमली” से जोड़ा जाता है
प्राकृतिक ग्लाइको अल्कलॉइड( Glyco alkaloid )- प्राकृतिक क्षारीय जहर –
प्राकर्तिक ग्लाइको अल्कलॉइड कई तरह के होते हैं कुछ नुकसान देह होते तो कुछ का कोई खास प्रभाव नहीं होता है लेकिन कुछ ग्लाइको अल्कलॉइड ऐसे होते हे जो हमारे दैनिक भोजन से सीधे जुड़े होते है जैसे सोलनीन,चाकोनाइन ,टोमैटिन आदी।
ग्लाइको अल्कलॉइड प्राय कुछ ही पौधों में पाया जाता है ये टमाटर ,आलू ,बैंगन व कुछ विदेशी जामुन जो भारत नहीं होते उनमे पाया जाता है।
टमाटर आलू व बैंगन पत्तो में सोलनीन पाया जाता है। ग्लाइको अल्कलॉइड – पाचन तंत्र को बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है इससे अपच व उल्टी होना आम बात है।
इसकी थोड़ी अधिक मात्रा अमाशय को नुकसान पंहुचा सकती है तथा तंत्रिका तंत्र पर भी सीधे असर डालती है। ग्लाइको अल्कलॉइड की अधिक मात्रा होने की स्थिति में लकवा या जान तक जा सकती है। लेकिन सावधानी रखी जाए तो ग्लाइको अल्कलॉइड की अधिकता को पहचाना जा सकता है।तथा इसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।
ग्लाइको केलॉइड की वजह से टमाटर और बैगन व आलू में कड़वाहट आ जाती है।भारतीय भोजन परम्परा में सब्जियों को काटते समय चखा जाता था। और अभी भी कई घरो में चखा जाता है। लौकी तोरई खीरा आदि तो आज भी पकाने से पहले चखे जाते है।
वही आलू के भंडारण में तेज रोशनी या धूप के सम्पर्क में आने से आलू में हरा रंग आ जाता है तथा उनमे अंकुरण (मुकुलन ) होना शुरू हो जाता है। जो आलू में ग्लाइको केलॉइड की मात्रा बढ़ने का संकेत है।ग्लाइको अल्कलॉइड को सब्जियों से हटाया नहीं जा सकता है।सब्जियों को उबालने और तलने से भी नाम मात्र की कमी होती है।
लेकिन पकाने से कड़वापन खत्म हो सकता है जो की खतरनाक है।कई बार दावतों और होटल ढाबे के खाने में ऐसी सब्जियों के स्वाद और स्वरूप को लेकर नजरअंदाज किया जाता है। जो की किसी को भी फ़ूड पॉइज़निंग कर सकता है।
ग्लाइको एल्कलॉइड से ब्लैकवुड सिंड्रोम (Blackwood Syndrome): इस बीमारी में व्यक्ति का खुद पर नियंत्रण काम हो जाता है। ड्रॉव्सी (Drowsiness): कुछ ग्लाइको एल्कलॉइड सेदेवन के बाद ड्रॉव्सी या नींद आ सकती है।उल्टियां (Nausea): मतली (Vomiting)मानसिक बीमारियां (Mental Disorders): कुछ ग्लाइको एल्कलॉइड के सेवन के बाद मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने की संभावना होती है, और व्यक्ति में उत्तेजना, चिंता, या अन्य मानसिक बीमारियों के लक्षण हो सकते हैं।
स्वस्थ रहना हर किसी का निजी मामला है। हर कोई स्वस्थ रहना चाहता है। फ़ूडमेन आपके लिए खाद्य संबंधित जानकारियों का संग्रहण करता है। ताकी आप सचेत रहे।
क्या आप जानते हैं ?
तीखुर -एक प्राकृतिक बहुमुखी दवा

तीखुर (Curcuma angustifolia) एक पौधा है जो भारत का मूल निवासी है। इसके कई स्वास्थ्य लाभों के लिए सदियों से पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग किया जाता रहा है।

भारत में अलग अलग राज्यों में इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है। उड़ीसा में इसे पलुवा व तीखुर ,कन्नड़ में कोविहिट्टू ,गुजरती में तेवखरा नाम से जाना जाता है। इसका प्रचलित नाम अरारोट है।जिसका सही उच्चारण एरोरूट (arrowroot) है। लेकिन भारत में मक्की के स्टार्च को भी अरारोट ही बोलते है। क्यों की दिखने व स्वभाव से दोनों एक जैसे ही लगते है। जबकि शरीर में इनका व्यवहार बिलकुल विपरीत होता है।
पौधे के प्रकंद वह भाग होते हैं जो औषधीय रूप से उपयोग किए जाते हैं। उनमें एक स्टार्च होता है जो आसानी से पचने योग्य होता है और जिसमें कई लाभकारी गुण होते हैं। पाचन स्वास्थ्य तीखुर के सबसे आम उपयोगों में से एक पाचन स्वास्थ्य के लिए है। राइजोम में मौजूद स्टार्च एक शांतिदायक होता है, जिसका अर्थ है कि यह पाचन तंत्र के स्तर को शांत करता है और उसकी रक्षा करता है।
इसका उपयोग अक्सर दस्त, पेचिश और अन्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है। तीखुर के कई अन्य स्वास्थ्य लाभ भी हैं। यह आहार फाइबर का एक अच्छा स्रोत है, जो मल त्याग को विनियमित करने और समग्र पाचन स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। यह पोटेशियम, मैग्नीशियम और कैल्शियम समेत विटामिन और खनिजों का भी एक अच्छा स्रोत है। ये पोषक तत्व दिल के स्वास्थ्य, रक्तचाप के नियमन और हड्डियों के स्वास्थ्य सहित कई शारीरिक कार्यों के लिए आवश्यक हैं। औषधीय उपयोग इसके पाचन लाभों के अलावा, भारतीय अरारोट का उपयोग कई अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के इलाज के लिए भी किया जाता है, जिनमें शामिल हैं: खांसी और जुकाम बुखार मूत्र मार्ग संक्रमण त्वचा की स्थिति एलर्जी कैंसर सुरक्षा और दुष्प्रभाव तीखुर को आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है जब इसे कम मात्रा में उपयोग किया जाता है।
हालांकि, इसके कुछ संभावित दुष्प्रभाव हैं, जैसे मतली, उल्टी और कब्ज। यदि आप इनमें से किसी भी दुष्प्रभाव का अनुभव करते हैं, तो आपको तीखुर का सेवन बंद कर देना चाहिए और अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए। तीखुर का उपयोग विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है। इसे भोजन में थिकनर के रूप में जोड़ा जा सकता है, या इसे चाय में बनाया जा सकता है। चाय बनाने के लिए, राइजोम को कुछ मिनट के लिए पानी में उबाल लें। चाय को शहद या चीनी से मीठा किया जा सकता है, और इसे गर्म या ठंडा लिया जा सकता है।
तीखुर कई स्वास्थ्य लाभों वाला एक बहुमुखी पौधा है। यह आहार फाइबर और विटामिन का एक अच्छा स्रोत है, और इसका उपयोग विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य स्थितियों के इलाज के लिए किया जा सकता है। यदि आप अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए प्राकृतिक तरीके की तलाश कर रहे हैं, तो तीखुर आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है।
तीखुर का औषधीय उपयोग अब मात्र उन्ही इलाको तक सीमित हो चूका है। जहां इसकी उपज होती है। इसका उपयोग फ़ूड इंडस्ट्री व मेडिकल इंडस्ट्री में बहुतायत से होता है।
कंज्यूमर कार्नर
क्यों बढ़ रहे है गेहू से एलर्जी के मामले ?

आज हम गेहूं को किस रूप में खा रहे है, किसी को पता नहीं। गरीबों को सरकारी गेहू किस रूप में मिल रहा है हर किसी को पता है। लेकिन जो लोग गेहू खरीद कर खा रहे है। क्या वो गेहू की गुणवत्ता के बारे में जानते है की वो हाइब्रिड गेहू है या केमिकल जहर से लिपटा हुवा अनाज है। गेहू ही जहरीला है या जहर लगा है ये पता कर पाना आसान नहीं है। लेकिन आसपास के माहौल से ये पता करना मुश्किल नहीं की कितने लोग गंभीर जीवनशैली बीमारियों से पीड़ित है। डाइबिटीज और बीपी तो सामान्य सी बीमारियां हो गई है। हर कोई या हर कोई का कोई इनसे पीड़ित है। लेकिन अब गेंहू से एलर्जी या गेहू के प्रति असहिष्णुता के मामले बढ़ते जा रहे है। एक अंदाजे के मुताबिक हर 10 एलर्जी टेस्ट में करीब दो से तीन टेस्ट में गेहू से एलर्जी या असहिष्णुता पायी गई है। अलग अलग क्षेत्र के अनुसार आंकड़े बदल सकते है। लेकिन उत्तर भारत व उत्तर भारत के मैदानी और गेहू प्रधान क्षेत्रो में आंकड़े लगभग यही है। बच्चो सीलिएक रोग का भी प्रतिशत बढ़ रहा है। वही उम्र के कोनसे पड़ाव में गेहू से एलर्जी या असहिष्णुता हो जाये,कहा नहीं जा सकता है। सीलिएक और गेहू की एलर्जी के लक्षण और ईलाज एक जैसे ही है।लेकिन गेहूं से असहिष्णुता का पता तब तक नहीं लगता जबतक की यह गंभीर न हो जाये। आमतौर पर शुरुवाती लक्षणों में गैस बनना ,कब्ज ,दस्त ,व त्वचा पर दाग धब्बे व त्वचा में एलर्जी जैसे लक्षण आते है। जो की आम दिनों में खाने-पीने की गड़बड़ी से हो ही जाते है।लेकिन गेहू की असहिष्णुता वाले मरीज प्राय:गंभीर स्थिती और चिकित्सक की सूझबूझ की वजह से ही पकड़ में आ पाती है।

अब गौर करने वाला बिंदु ये है की जिस व्यक्ति ने उम्र भर गेंहू ही खाया हो अचानक या धीरे धीरे गेहू के प्रति असहिष्णु कैसे हो गया। या गेहू में ही कोई बदलाव हुवा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की आप गेहू जैविक खेती का खाये या केमिकल खेती का या धो के अंकुरित करके खाये।
समय के साथ साथ आधुनिक कृषि विज्ञान ने गेहू को हर तरह के मौसम और परिस्थिति व कीट पतंगों और वनस्पतीय बीमारियों के प्रति अनुकूल तो बना लिया है। लेकिन वही गेहू की अनुकूलता अब इंसानों के लिए असहिष्णुता ला रही है। जानवरों पर भी असर हुवा होगा। लेकिन जानवर लोकतंत्र का जरिया हो सकते है लोकतंत्र का हिस्सा नहीं। कृषि विज्ञान का प्राथमिक उद्देश्य ही ऊपज बढ़ाना और नए बीज तैयार करना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की उस हाईब्रीड फसल से इंसानो पर तुरंत व दीर्ध काल के बाद क्या फर्क पड़ेगा। उसके लिए चिकित्सा व औषधी विज्ञान है। लेकिन दोनों ही तरह के विज्ञान की जुगलबंदी नहीं होती या नहीं होने दिया जाता है।
ब्लॉग
चीनी नहीं कृत्रिम मिठास है खतरनाक

हम भारतीय ही थे जिन्होंने गन्ने से चीनी बनाने के विज्ञान की शुरुवात की थी। हम भारतीयों ने ही 350 ईस्वी में गुप्त वंश के दौरान ही चीनी को क्रिस्टलीकरण करने की खोज कर ली थी।हालाँकि कई भारतीय ग्रंथो और धार्मिक किताबो में चीनी और मिश्री ,खाण्ड और गुड़ का जिक्र मिलता है। यानी की हम भारतीय सदियों से चीनी खाते आये है। और चीनी से होने वाले रोगो की भी जानकारी हमारे इतिहास में दर्ज है।विशेष रूप से “मधुमेह”।लेकिन आज उसी चीनी को लेकर एक अलग ही कहानी सुनाई जा रही है। बतायी जा रही है।पिछले सात दशकों से हम भारतीयों व विश्व भर में डायबिटीज के बढ़ते प्रकोप में चीनी को ही जिम्मेदार बता दिया जाता है। जो की आधा सच है।
कुछ दिनों पहले रेवंत हिमतसिंग्का के बोर्नविटा में कितनी चीनी है का वीडियो वायरल हुवा था। जिसमे रेवंत ने बोर्नविटा में कितनी चीनी है का खुलासा किया। हालाँकि बोर्नविटा के नोटिस पर रेवंत ने सार्वजानिक माफ़ी माँग ली। जो की अभी भी संदिग्ध है। तथा एक बार फिर से रेवंत ने अपने वीडियो शेयर करने शुरू कर दिए है।रेवंत की तरह और भी कई लोग उत्पादों में चीनी का विश्लेषण करने लगे है। जो की एक अच्छी शुरुवात है जनता द्वारा उत्पादों की सामग्री का विश्लेषण खाद्य सुरक्षा व प्रोसेस फ़ूड इंडस्ट्री से होने वाली जीवनशैली बीमारियों के विरुद्ध एक मिल का पत्थर साबित हो सकता है।
लेकिन इसमें चिंता का विषय चीनी को लेकर भ्रम की स्थिति है। जिसे सीधा डाइबिटीज से जोड़ कर देखा जाता है। जबकि यह सच्चाई का एक पहलू मात्र है।इस बात में कोई शक नहीं की चीनी डायबिटीज के कारणों में से एक कारण हो सकता है। लेकिन सिर्फ चीनी ही डायबिटीज का कारण नहीं हो सकती है। यह भ्रम प्रोसेस फ़ूड व दवा बनाने वाली व सुगर फ्री बनाने वाली कम्पनीज का सयुक्त अजेंडा है। विशेष रूप से पश्चिमी व यूरोपियन देशो में चीनी को बदनाम करने और कृत्रिम मिठास के तत्वों से ध्यान हटाने के लिए कथा कथित “सुगर माफिया”,शुगर इंडस्ट्रीज आदी नामो का उपयोग किया जाता है।
जबकि सच्चाई ये है की 1950 के दशक के बाद से ही प्रोसेस फ़ूड में कृत्रिम मिठास (चीनी) धीरे धीरे अपने पांव पसारने शुरू कर दिए थे। और आज ऐसा दौर है की लगभग हर मीठा प्रोसेस फ़ूड कृत्रिम मिठास के साथ ही आता है।तथा डाइबिटीज का कारण बनता है। लेकिन बदनाम चीनी को ही किया जाता है।
इसलिए अगली बार जब भी किसी उत्पाद की सामग्री देखे तो चीनी की मात्रा के साथ साथ कृत्रिम मिठास के अवयव को भी पहचानना सीखे। अधिक जानकारी के लिए पढ़े
मीठे जहर : वैकल्पिक स्वीटनर (Sweetener ) – E -950-E -969
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पॉइज़न: द डर्टी ट्रुथ अबाउट योर फ़ूड, ” : एक डॉक्यूमेंट्री

इसी साल के ट्रिबेका फेस्टिवल में अपना वर्ल्ड प्रीमियर करेगी।
पॉइज़न: द डर्टी ट्रुथ अबाउट योर फ़ूड, ”
पॉइज़न: द डर्टी ट्रुथ अबाउट योर फ़ूड, डॉक्यूमेंट्री जेफ बेनेडिक्ट के 2013 बेस्टसेलर पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री,” ज़हर: द ट्रू स्टोरी ऑफ़ द डेडली ई -कोलाई आउटब्रेक दैट चेंजिंग द वे अमेरिकन ईट “इस साल के ट्रिबेका फेस्टिवल में अपना वर्ल्ड प्रीमियर करेगी।
ट्रिबेका एंटरप्राइजेज एक मल्टी-प्लेटफॉर्म मीडिया और एंटरटेनमेंट कंपनी है। 2003 में रॉबर्ट डी नीरो, जेन रोसेंथल और क्रेग हाटकॉफ द्वारा स्थापित, ट्रिबेका एंटरप्राइजेज फिल्म, टीवी, संगीत, ऑडियो स्टोरीटेलिंग, गेम्स और इमर्सिव सहित सभी रूपों में कहानी कहने का जश्न मनाने के लिए कलाकारों और दर्शकों को एक साथ लाता है।
7-18 जून तक होने वाले इस फेस्टिवल में 36 देशों के 127 फिल्म निर्माताओं की 109 फीचर फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा। इस साल के समारोह में 93 विश्व प्रीमियर, एक अंतरराष्ट्रीय प्रीमियर, आठ उत्तरी अमेरिकी प्रीमियर, एक यू.एस. प्रीमियर और छह न्यूयॉर्क प्रीमियर शामिल हैं। लाइनअप पर 53 वृत्तचित्र सुविधाओं में “ज़हर: द डर्टी ट्रुथ अबाउट योर फ़ूड” शामिल है।
पॉइज़न डॉक्यूमेंट्री में 1993 जैक इन द बॉक्स ई. कोली प्रकोप और खाद्य सुरक्षा वकील के रूप में बिल मार्लर के उदय का वर्णन किया है। फिल्म अमेरिका की खाद्य आपूर्ति प्रणाली के विकास और इतिहास के साथ-साथ कुख्यात प्रकोपों के पीड़ितों की अनकही कहानियों और जिम्मेदार लोगों के लिए हाई-प्रोफाइल आपराधिक मुकदमों के बारे में बताती है
ट्रिबेका फेस्टिवल के लिए पास और टिकट पैकेज Tribecafilm.com पर उपलब्ध हैं, जिसमें सिंगल टिकट 2 मई को बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। फेस्टिवल के स्पॉटलाइट+ प्रीमियर के बाद एलिसिया कीज़, सारा बरेलीस, ग्लोरिया गेन्नोर, डैन राथर, गोगोल बोर्डेलो के साथ लाइव इवेंट होंगे। ,
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जानलेवा होती गेहूं और गेहूं की तलब भाग 2

नशीला गेहूं
“अपने को तो सिर्फ “रोटी ” का नशा है। ये वाक्य आपने कई लोगो के मुँह से सुना होगा। सामान्यत : इसका मतलब व्यसन मुक्त और सिर्फ खाने तक ही सीमित समझा जाता है। क्यों की खाना तो जरूरी है। सुनने में आपको अजीब या आश्चर्यजनक लग सकता है। की गेहूँ भी नशीला होता है। नशीला जितना अफीम या मॉर्फिन जैसे तत्व होते है।ये कोई नई बात नहीं है। लेकिन इसकी चर्चा को व सम्बंधित सूचना को जानबूझ कर आपसे दूर रखा जाता है। क्यों की खाद्य व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी नहीं चाहती कि आप उस विज्ञान की समझ रखे जो बिक्री के लिए आपके विरुद्ध काम में लाये जाते है।
भोजन की लत ( Food addiction ) के विज्ञान 1980 से ही रिसर्च अध्ययन शुरू हो चुके थे। जिनमे से अधिकतर को जनता या सार्वजानिक मंचो से छुपाया गया। क्योंकि इससे बिक्री पर असर पड़ता और छुपाये जाने की स्थिती में बिक्री और बढ़ायी जा सकती थी। और बढ़ी भी। पश्चिमी देशो में गेंहूं 1980-90 की दशक से ही विवादित रहा है।सिलिअक डिसीज या गेहूं असहिष्णुता के बढ़ते मामलो की वजह से हुये अध्ययनो में कई चौंका देने वाली जानकारियां सामने आयी जिसमें से ही एक थी, गेहूं के ग्लूटेन का अफीम की तरह शरीर में होने वाले प्रभाव।
आसान भाषा में समझे की गेहूँ के मुख्य प्रोटीन ग्लूटेन जो की पाचन में कई तरह के अणुओं एमिनो एसिड और पेप्टाइड में विखंडित होकर शरीर के लिए अवशोषित हो जाता है। ग्लूटेन ग्लूटोमोर्फिन या ग्लूटेन एक्सोर्फिन नामक पेप्टाइड जिसका व्यव्हार अफीम में पाये जाने वाले पेप्टाइड की ही तरह नशीला होता है। दोनों के नशे का फर्क मात्रा और नैतिकता से जुड़ा हुवा है। अफीम में मादक पेप्टाइड अधिक होते है। तथा ग्लूटेन में पेप्टाइड की मात्रा कम होती है और भूख से जुड़े होने की वजह से नैतिकता का भाव रहता है। इस बात की खोज ही ये देखते हुवे हुवी थी की गेहूं असहिष्णुता के मरीजों को सिर्फ गेंहूं छोड़ने को कहा गया फिर भी उन लोगो के चिकित्सीय परीक्षणों में गेंहू का सेवन पाया गया।
शुरुआत में माना गया की गेहूं कई तरह की खाद्य सामग्री का मुख्य या आंशिक भाग होता है। इसी वजह से उनके परीक्षणों में गेहूं या ग्लूटेन पाया गया। लेकिन फिर भी कोई असर नहीं हुवा। कड़ी निगरानी में गेहूं या ग्लूटेन असहिष्णु मरीजों में चोरी छिपे ग्लूटेन उत्पादों का उपभोग करते पाया गया। तब हुवे परीक्षणों में ग्लूटेन के पेप्टाइड में छिपा नशीलापन सामने आया। 1987 में ही खाद्य व्यसन अनाम ( Food Addicts Anonymous ) की स्थापना की गई थी जिसका उद्देशय शराब व अन्य नशे के पीड़ितों के लिए छोड़ने के कार्यकर्मो की समीक्षा करना था लेकिन ग्लूटेन व अन्य खाद्य प्रदार्थो में छिपे नशीले तत्वों को देखते हुवे इसको खाद्य पर केंद्रित किया गया।
स्वास्थ्य और जीवनशैली
विटामिन का मायाजाल भाग -4

जैसा की पहले के लेखो में बताया जा चूका है की विटामिन को लेकर हमारे मन में और हमारी शिक्षा प्रणाली में सब कुछ पोषण और सिर्फ पोषण के बारे में ही बताया गया है। जिसका फायदा बड़े औद्योगिक घराने पिछले 70 सालो से उठाते आ रहे है। जो की चिकित्सीय प्रणाली और विज्ञापन के माध्यम से हमारे मन मस्तिष्क में जड़वत बिठा दी गई है। जैसा की विटामिन से होते खतरों के बारे में भी हमने पिछले लेखो में संछिप्त व सार पूर्ण बताया है। आज बात करेंगे सुडोविटमिन की।
सुडोविटामिन(Pseudo-vitamin)
सुडो-विटामिन उन तत्वों को कहते है। जिनकी संरचना बिलकुल विटामिन जैसी होती है। लेकिन मानव शरीर के लिए इनका कोई उपयोग नहीं होता है। और अगर बहुत असर भी होता है तो इनका असर व्यक्ति विशेष पर या तो होता ही नहीं है और होता है तो भी कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। विटामिन्स को क्रमशः करके देखेगे तो आपको कई क्रमांक व अक्षर नजर नहीं आएंगे। जैसे अक्षर – विटामिन जी ,विटामिन ऐल तथा क्रमांक विटामिन बी 4 विटामिन बी 10 ,आदि।
ऐसा नहीं है की ये होते नहीं है। होते है लेकिन कोई विशेष काम के नहीं होते है। शुरुवात में चिकित्सीय विज्ञानं ने इनको अपनी लीस्ट में रखा लेकिन जैसे जैसे इनके असर पर अनुसंधान हुवे वैसे वैसे इनको हटा दिया गया। इन हटाए गए विटामिन को ही चिकित्सीय भाषा में सुडो-विटामिन कहा गया है।
वही कुछ खाद्य विशेषज्ञ आज के चिकित्सा क्षेत्र और प्रोसेस फ़ूड में उपयोग में होने वाले विटामिन को भी सुडो-विटामिन ही मानते है। क्योकि फैक्ट्री में निर्मित विटामिन का स्रोत क्या होता है। यह सार्वजनिक रूप से जनता के सामने नहीं है। विटामिन सी या डी या ई प्राकृतिक रूप से खाद्य वनस्पतियों में पाए जाते है जिनको पचने के लिए मानव शरीर अनुकूल है। लेकिन सिंथेटिक रूप से बनाये विटामिन कई रासायनिक प्रक्रिया और कई रसायनो का मेल होता है। जिनमे से कुछ प्रदार्थ या प्रतिशत ही मानव शरीर को स्वीकार होते है। जिससे या तो ऐसे विटामिन को शरीर द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। लेकिन कई बार इनके दुष्प्रभाव भी देखने को मिलते है। विशेष कर इन सिंथेटिक विटामिन में प्रयुक्त रसायनो से शरीर को एलर्जी हो जाती है। जिसके चलते और भी कई तरह की एलर्जी शुरू हो जाती है।
प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले विटामिन ज्यादा स्थिर नहीं रहते तथा अपने से ही कम या खत्म हो जाते है। इसी लिए चिकित्सा क्षेत्र में सिंथेटिक विटामिन्स का उपयोग होता है। जो की खाद्य पूरक के रूप में दर्शा कर बेचे जाते है। ऐसे किसी भी विटामिन या खाद्य पूरक दवा की गोली या टेबलेट के पीछे आप हमेशा लिखा पाएंगे की यह दवा के रूप में उपयोग में नहीं लाया जा सकता है ( Not for medicinal use )
ये एक विडंबना ही है की भारत जैसे गरीब देश में गरीबो को विटामिन फ़ूड सप्लीमेंट दवा की पर्ची में दवा के रूप में लिखा जाता है लेकिन बेचने में इसे साफ साफ शब्दों में दवा के रूप में उपयोग नहीं लेने का लिखा जाता है। ऐसे में पढ़े लिखे समुदाय में भी विटामिन व विटामिन सप्लीमेंट को लेकर एक आकर्षण देखने को मिलता है।जिनका मूल्य मनमानी तरह से लिया जाता है। विटामिन को लेकर एक ऐसा मायाजाल आप अपने चारो और पाएंगे जिसका कोई फर्क आपके जीवन या शरीर पर पड़े न पड़े लेकिन आपकी जेब पर जरूर पड़ता है। कभी एक संतरे को या किसी भी फल के विटामिन को एक टेबलेट के विटामिन से तुलनात्मक रूप में दिखाया जाता है।
फ़ूडमेन विटामिन के सिंथेटिक रूप को लेकर अब तक के हुवे दुनिया भर के अनुसंधानों और रिसर्च रिपोर्ट के हवाले से ये लेख आप तक लेकर आया है। हालाँकि ये लेख इंटरनेट पर मुक्त रूप से विद्यमान है। लेकिन विटामिन को लेकर इतनी सकारात्मकता फैलाई गई है की कोई विटामिन व सिंथेटिक विटामिन के बारे में नकारात्मक सोच ही नहीं सकता। फ़ूडमेन की यही कोशिश है की खाद्य के वो अनछुवे तथ्य आपके सामने लाये जिनसे बच कर आप अपना जीवन स्वस्थ और आसानी से जी सके। क्रमशः जारी
स्वास्थ्य और जीवनशैली
विटामिन का मायाजाल :भाग 3

एंटीविटामिन
विटामिन। कुछ दशकों पहले माना जाता था की मानव शरीर में विटामिन की अधिकता होना असंभव है।और आज भी यही जानकारी इंटरनेट और सामान्य किताबो में आप देख पढ़ सकते है। लेकिन वर्तमान स्थिति पहले की स्थिति से बिलकुल उलट है। आज 30 प्रतिशत से भी ज्यादा लोग विटामिन अधिकता या विषाक्ता के शिकार है। जिनमे से अधिकतम लोगो को पता ही नहीं होता की उनके खाने से मिलने वाला विटामिन अब उनको ही खाने लगा है। लेकिन उनके चिकित्सक को पता होता है।
एंटीविटामिन
एंटीविटामिन या प्रतिविटमिन उन तत्वों को कहते है जो प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से विटामिन का अवशोषण बाधित या पूर्ण रूप से रोक देते है। ये प्राकृतिक रूप से और सिंथेटिक रूप दोनों तरह के हो सकते है। प्राकृतिक वाले महत्वपूर्ण है लेकिन यहाँ बात सिंथेटिक एंटीविटामिन की करेंगे। जो की कई बीमारियों के इलाज में दिए जाते है।
शरीर में खास विटामिन के खास काम होते है। जब भी खाने में या फ़ूड सप्लीमेंट या ईलाज आदि से किसी खास विटामिन का घनत्व शरीर में बढ़ जाता है। तो शरीर पर इसके दुष्प्रभाव पड़ते है। जिनको रोकने और नियंत्रण में लेन के लिए एंटी विटामिन का उपयोग होता है। विशेष रूप से कैंसर गठिया और ह्रदय व रक्त सम्बन्धी रोगो में इनका उपयोग किया जाता है। विटामिन्स शरीर की हर कोशिका के लिए जरुरी होता है। चाहे वो स्वस्थ कोशिका हो या म्युटेंट और कैंसर की कोशिका हो। इसीलिए कैंसर के ईलाज में एंटीविटामिन तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है।जैसे शरीर में खून का थक्का बनाने के लिए विटामिन के (K) का होना जरुरी होता है। लेकिन अवस्था व और भी कारणों से थक्के को बनने के लिए रोकने के लिए थक्का रोधी दवाये दी जाती है जो की विटामिन के की मात्रा को नियंत्रित करती है। इसी तरह से गठिया रोग में भी विटामिन बी 9 को कम करने की एंटीविटामिन दवा दी जाती है।
इन्ही जानकारियों से आप अंदाजा लगा सकते है की विटामिन अधिकता या विषाक्ता हमारे बीच में कितनी फ़ैल रही है। जिसके दो मुख्य कारण है। पहला प्रोसेस फ़ूड में शामिल विटामिन जो की परिरक्षक( प्रिजर्वेटिव) का काम करते है। लेकिन साथ ही शरीर को जरुरत से ज्यादा विटामिन पंहुचा देते है। दूसरा मुख्य कारण हेल्थ सप्लीमेंट में अंधाधुंध विटामिनो को खपाना और उन उत्पादों के अतिआशावादी विज्ञापन विशेषरूप से जिम व बॉडी बनाने और मोटे से पतले होने के उत्पादों में धड़ल्ले और सुरक्षित सीमा से दोगुने चार गुणी मात्रा में विटामिन दिए जा रहे है वही कुछ चिकित्सक भी अतिरिक्त आय के चक्करो में मरीज को मल्टीविटामिन या कुछ विशेष विटामिन लेने की सलाह देते है। जिसके चलते आज के दौर में विटामिन विषाक्ता चरम पर है।
लेकिन विटामिन एक बड़ा बाजार और मुनाफे का सौदा होने की वजह से चिकित्सा क्षेत्र और मिडिया खामोश तमाशा देख रहा है। और लोगो की जान जा रही है। मामला केप्सूल फोड़ कर चेहरे पर लगाने तक सिमित होता तो ठीक था लेकिन हेल्थ सप्लीमेंट सेक्टर और प्रोसेस फ़ूड की जुगल और चिकित्सा तंत्र से उपजा ये छिपा हुवा खतरा आज समाज में जानलेवा हो चूका है। और इसके छिपे रहने का कारण हमारी शिक्षा प्रणाली में विटामिन्स खूबियों का बखान है। क्रमशः जारी
स्वास्थ्य और जीवनशैली
विटामिन का मायाजाल -भाग 2

विटामिन दो तरह के होते है पानी में घुलनशील और वसा ( फैट ) में घुलनशील। अभी तक के ज्ञात चिकित्सीय विज्ञानं में मनुष्यो में 13 विटामिन तथा उनके सक्रिय या असक्रिय तत्वों को शामिल किया गया है। जिनमे से चार में वसा घुलनशील होते है यानी की इन विटामिनो घुलने के लिए वसा माध्यम का होना जरुरी होता है। विटामिन vit.A (ए) D (डी ). E (ई) K (के) चारो वसा में घुलनशील है। तथा शेष आठ विटामिन बी तथा विटामिन सी पानी में घुलनशील होते है। यही वजह है की जब भी आपको विटामिन देते है विशेषरूप से वसा घुलनशील तब आपको दूध के साथ लेने को कहा जाता है। दूध उन कुछ प्रदार्थो में से एक है जिसमे पानी और वसा एकसाथ होता है जिससे किसी भी माध्यम में घुलने वाले विटामिन के लिए आदर्श माना जाता है।

